अफगान मंत्री की सफाई: प्रेस कॉन्फ्रेंस में महिला पत्रकारों की अनुपस्थिति पर नाराजगी के बाद अफगान मंत्री ने स्पष्टीकरण दिया

AMIR KHAN MUTTAQI

नई दिल्ली, 12 अक्टूबर 2025 — अफगानिस्तान के विदेश मंत्री अमीर खान मुत्ताकी ने भारत की राजधानी दिल्ली में आयोजित एक प्रेस वार्ता (प्रेसर) में महिला पत्रकारों को शामिल न किए जाने को लेकर हुई तीव्र आलोचना के बाद सफाई दी है। उन्होंने कहा कि यह एक “तकनीकी समस्या” थी, किसी जानबूझकर बहिष्करण का मामला नहीं।

घटना की पृष्ठभूमि

  • मुत्ताकी ने दिल्ली में भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर के साथ वार्ता के बाद एक मीडिया संवाद रखा। उसमें यह बात मीडिया और विपक्ष द्वारा उठाई गई कि उस संवाद में कोई महिला पत्रकार आमंत्रित नहीं हुई थी
  • इस विषय पर विरोध के स्वर बहुत तेज़ थे — पत्रकार संगठन, राजनीतिक दल और सामाजिक वर्गों ने इसे लिंग-भेद और प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला बताया।
  • विरोध और सार्वजनिक दबाव के बाद, मुत्ताकी ने दो दिनों बाद एक और प्रेस मीट आयोजित की जिसमें महिला पत्रकारों को शामिल किया गया।

मुत्ताकी की सफाई: “तकनीकी समस्या”

मुत्ताकी ने कहा कि:

“प्रेस कॉन्फ्रेंस को कम समय पर आयोजित किया गया था। (आमंत्रण) सूची सीमित थी। यह अधिकतर एक तकनीकी समस्या थी, और कोई अन्य मंशा नहीं थी।”
“हमारे सहयोगियों ने एक विशिष्ट सूची पर पत्रकारों को आमंत्रित करने का निर्णय लिया था। इसमें और कोई इरादा नहीं था।”

उन्होंने यह भी कहा कि अफगानिस्तान में शिक्षा में लाखों छात्र हैं, जिनमें 2.8 मिलियन से ज़्यादा महिलाएं और लड़कियाँ शामिल हैं, और उन्होंने यह तर्क दिया कि महिलाओं की शिक्षा “धार्मिक दृष्टिकोण से हराम” घोषित नहीं की गई है — बल्कि कुछ सीमाएँ अस्थायी रूप से लागू हैं।

राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ

  • मीडिया संगठनों ने नाराज़गी व्यक्त की:
    • The Editors Guild of India और Indian Women Press Corps (IWPC) ने इस घटना को “भेदभावपूर्ण” और “अस्वीकार्य” बताया और कहा कि इसका किसी भी तरह से औचित्य नहीं ठहराया जा सकता।
    • विवाद को लेकर यह भी कहा गया कि “राजनयिक विशेषाधिकार” नाम पर लिंग-आधारित बहिष्करण की रक्षा नहीं हो सकती।
  • राजनीतिक नेताओं की टिप्पणी:
    • कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस घटना पर प्रधानमंत्री मोदी पर हमला किया, कहा कि महिलाओं को सार्वजनिक मंच से बाहर करना “निर्दोष नहीं” है।
    • प्रियंका गांधी वाड्रा ने मोदी से “स्थिति स्पष्ट करने” का आग्रह किया।
    • पूर्व मंत्री पी. चिदम्बरम ने कहा कि यदि महिला पत्रकारों को बाहर रखा गया हो, तो पुरुष पत्रकारों को संवाद छोड़ देना चाहिए था।
  • भारत सरकार की प्रतिक्रिया:
    भारत के विदेश मंत्रालय (MEA) ने स्पष्टीकरण दिया कि उसने इस प्रेस मीट के आयोजन में कोई भूमिका नहीं ली थी।

संदेश और अर्थ

1. प्रतिनिधित्व और समावेशन का महत्व

यह मामला दिखाता है कि मीडिया समावेशन और महिला प्रतिनिधित्व कितने संवेदनशील मुद्दे हैं। एक प्रेस मीट जैसे सार्वजनिक अवसर पर महिलाओं को शामिल न करना नापसंदीदा छवि उत्पन्न करता है, विशेष रूप से उस सरकार के लिए जो महिलाओं के अधिकारों को लेकर पहले ही आलोचनाओं के घेरे में है।

2. सहज बहिष्करण या प्रणालीगत समस्या?

मुत्ताकी ने इसे “तकनीकी समस्या” कहा है, लेकिन विरोधियों और मीडिया संगठनों का दावा है कि यह एक लापरवाही नहीं बल्कि संरचनात्मक पूर्वाग्रह का उदाहरण हो सकता है। यदि एक आयोजक तय कर ले कि कौन पत्रकार आमंत्रित हों, तो उसमें चयन के मानदंड स्पष्ट होना चाहिए।

3. धीमा सुधार या केवल दृश्य प्रतिक्रिया?

महिला पत्रकारों को दूसरी प्रेस मीट में बुलाया जाना एक सुधार का संकेत हो सकता है, लेकिन यह सवाल बना रहता है: क्या यह वास्तव में एक सचमुच की परिवर्तनात्मक प्रक्रिया है या सिर्फ सार्वजनिक दबाव से दी गई एक प्रतिक्रिया?

4. आने वाले समय की चुनौतियाँ

ताबड़तोड़ अंतरराष्ट्रीय यात्रा और मीडिया कवर के दौर में ऐसे विवाद से सरकारों की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं। मीडिया स्वतंत्रता, लिंग समानता, सार्वजनिक संवाद — ये तीनों तत्व इस मामले में टकरा गए हैं।

अफगानिस्तान के विदेश मंत्री मुत्ताकी द्वारा दी गई सफाई और बाद की प्रेस मीट में महिलाओं का शामिल होना एक कदम ज़रूर है, लेकिन यह घटना एक बड़े प्रतीक के तौर पर देखी जाएगी — कि किस तरह लोकतंत्र, प्रेस आज़ादी और महिला अधिकारों के बीच संतुलन बनाए जाना चाहिए। यह साबित करता है कि सार्वजनिक संवाद में केवल “शब्दों का उद्घोष” काफी नहीं; कार्रवाई और निरंतरता ज़रूरी है।